बुधवार, 4 मार्च 2009

अन्मिले शितिज !


आज लद कर चल दिया
काँधे पर ये शव मेरा ,
जिन पर खेलकर बीता था ,
नन्हा सा शेशव मेरा !

माँ मेरी मुझे जिस छाती से
लगाए सुलाती थी ,
लोरी गाती थी ,
आज उसी छाती को पीट रही है
उठ बेटी !उठ जाना बेटी , बोल रही है

शायद ये सोचकर की उसका रुदन मेरी आँखें खोल दे !
मगर माँ को मैं ये कैसे समझाऊ ,
मैं सोई हूँ , अपने नए कल को अपनी आँखों में दबाए
अब यह सम्भव नही की
कोई मुझे
इस नींद से जगाए !

माँ तुझे मैं कैसे ये बतलाऊ ,
मैं
हर सुख - दुःख ,दर्द से बहुत दूर हूँ ,
उतनी ही दूर
जितनी दूरी पर चाँद मेरे बचपन से था |

मैं निश्चिंत हूँ माँ ,
मैं निश्चिंत हूँ !
क्योकि
अपनी थाह को मैंने ,
अथाह में समा लिया है !
अब धरती और चाँद को ,
अपनी गोद मैं छिपा लिया है !

माँ मैं चल पड़ी हूँ उस राह पर जहाँ सुकून है
शान्ति है ,
उज्जवलता है ,
निर्मलता है ,
यहाँ कोई हलचल नही है ,
हाँ
माँ
कौई हलचल नही है !

बस हैरत मैं हूँ , ये देखकर !
हाँ हैरत मैं हूँ !
यहाँ चाँद ज़मी चूमता और लाशें साँस लेती नज़र आती है |

1 टिप्पणी:

Faiz ने कहा…

your work is very good
keep it up!!!!!!!!!!!
the title of the poem according to me should be "Anant nidra"